बुधवार, 25 दिसंबर 2019

माटी मेरे गाँव की..

माटी मेरे गाँव की 
विधा :मुक्त गीत

माटी मेरे गाँव की, मुझको रही पुकार।
क्यों मुझको तुम भूल गए, आ जाओ एक बार।।

बूढ़ा पीपल बाँह पसारे ।
अपलक तेरी राह निहारे।।
अमराई कोयलिया बोले।
कानों में मिसरी सी घोले।।
ऐसी गाँव की माटी मेरी
तरसे जिसको  संसार।।

क्यों मुझको तुम भूल गए, आ जाओ एक बार।।

स्नेहिल रस की धार यहाँ।
मलयज की है बहार यहाँ।।
नदिया की है निर्मल धारा।
शीतल जल है सबसे प्यारा।।
भोरे कुक्कुट बांग लगाए
मिला सहज उपहार ।।

क्यों मुझको तुम भूल गए, आ जाओ एक बार।।

माँ अन्नपूर्णा यहाँ विराजें।
ढोल मंजीरे मंदिर बाजे।।
खलिहानों में रत्न पड़े हैं।
हीरे - मोती खेत जड़े हैं।।
मन की दौलत पास हमारे
है सुंदर व्यवहार।

क्यों मुझको तुम भूल गए आ जाओ एक बार।।

पुकारती पगडंडियाँ।
इस ओर फिर कदम बढ़ा।।
माटी को आके चूम लो।
एक बार गांव घूम लो।।
हम अब भी अतिथि को पूजें
हैं ऐसे संस्कार।।

क्यों मुझको तुम भूल गए, आ जाओ एक बार।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. गाँव का बहुत सुंदर चित्रण ,लाज़बाब ,सादर नमन सुधा जी

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया 🙏 🙏 स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर.

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-12-2019) को "शब्दों का मोल" (चर्चा अंक-3562)  पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है 
    ….
    -अनीता लागुरी 'अनु '

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २७ दिसंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. बहुत प्यारी कोरी कोरी प्रस्तुति ।

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    उत्तर
    1. जी दी एकदम कोरी ,करारी ,प्यारी।आभारी हूँ दी🙏🙏🙏

      हटाएं
  5. गाँव का अच्छा शब्द-चित्रण ... पर अब माहौल सब जगह "परिवर्त्तन प्रकृत्ति का नियम है" को चरितार्थ करते प्रतीत हो रहे हैं ... शायद ...

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    उत्तर
    1. जी आदरणीय, आपका एक एक शब्द सही है।परंतु चाहती हूँ मेरी अपनी सोच है कि फिर से वही दौर आये।लौट आये वो दिन जिनको मैंने अपने शब्दों के माध्यम से जिया है उन्हें आत्मसात किया है।काश ......

      हटाएं

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