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गुरुवार, 9 मई 2019

घिनौनी निशानियां


कितना बेहतरीन था भूत मेरा
रहते थे हम सब साथ सदा.
न कोई अणु बम
न परमाणु बम.
न ईर्ष्या न द्वेष
न  ही मन में कोई रोष.
न थी कोई टेक्नोलॉजी
न ही सीमाओं पर फौजी.
न ये ऊंँची- नीची जातियाँ
ये तरक्की नहीं,
ये हैं तरक्की की घिनौनी निशानियांँ.
गुम है कहीं,
प्रकृति माँ की गोद का वो आनंद
झरने और नदियाँ, जो बहते मंद मंद.
चिड़ियों की चहक
और फूलों की महक.
काश पाषाण युग में ही
अपनी इस तरक्की का
कलुषित स्वरूप जान पाता.
तो आज अपनी इस अनभिज्ञता
पर न पछताता.
क्या पता था
कि ऐसा युग भी आएगा
जब व्यक्ति स्वयं को
इतना एकाकी पाएगा.
खुद को अनगिन
परतों के नीचे छुपाएगा
और चेहरे पर ढेरों चेहरे लगाएगा ....