मजबूरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मजबूरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

कहना तो था पर..

कहना तो था पर
 कभी कह न पाई!!!

सोचकर ये कि,
पड़ोसी क्या कहेंगे...
समाज क्या कहेगा....
दुनिया क्या कहेगी....
मैं कुछ कह न पाई!!!!

बांध दी किसी ने बेड़ियाँ जो पैरों में,
तो छुड़ाने की कोशिश भी न की.
उसे अपना नसीब समझ लिया!
नसीब से कभी लड़  न पाई! 
कहना तो था पर....

सदियों से लड़कियां चुप ही रही थी.
गाय की तरह चारदीवारी में खूंटे से बंधी थी.
आदत भी तो इसी परंपरा की थी.
फिर मैं कैसे ये परंपरा तोड़ देती!!
कैसे अपना मुँह खोल देती!!
मैं ये परंपराएं तोड़ भी न पाई.
मैं कुछ कह न पाई. 
कहना तो था पर....

चंचलता, कभी मेरी प्रकृति न थी.
कूप के मंडूक सी वृत्ति जो थी.
नदी की धार, बन बहने की प्रवृत्ति न थी.
अपने सागर में मिल न पाई!
मैं कभी कुछ कह न पाई! 
कहना तो था पर....

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

सुख का सूर्य

सुख का सूर्य है कहाँ, कोई बताए ठौर!
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण देख लिया चहुँ ओर!!
देख लिया चहुँ ओर कि बरसों बीत गए हैं!
चूते चूते घट भी अब तो रीत गए हैं!!
राम कसम अब थककर मैं तो चूर हो गया!
रोज हलाहल पीने को मजबूर हो गया !!
नेताओं के छल को मैं तो समझ न पाता !
निशि दिन उद्यम करने पर भी फल नहीं पाता !!
फल नहीं पाता, विधि ने कैसा रचा विधान!
खेतों में हल था मेरा, चूहे ले गए धान!!
आरक्षण के कारण, वे चुपड़ी रोटी खाते!
खोकर अपना हक, हम भूखे ही हैं  सोते !!
समीप देख परीक्षा हम जी जान लगाएँ!
बिना किसी मेहनत के वे पदस्थ हो जाएं!!
ज्यादती है यह सब, है नहीं बचा अब धैर्य!
कोई बता दो मुझे कहाँ है सुख का सूर्य!!
Pic credit :Google

शनिवार, 18 जुलाई 2015

हम हंसने को मजबूर हो गए।




अश्रु  आखों  से  क्या  गिरे,
वो हमसे ही दूर हो  गए।
झूठी  हंसी  दिखाने  को,
हम भी  मजबूर  हो गए ।

वक्त  भी  बड़ा सितमगर है,
अपने  ही  मगरूर  हो गये।
हम पर प्यार लुटाने  वाले ,
न जाने क्यों  क्रूर  हो गये।

कैसा दस्तूर है  दुनिया  का ,
दिल  में  लाखों  गम  समेट कर  भी
हम हंसने  को मजबूर  हो  गए।