pankhudiya

Tuesday, 20 November 2018

कुछ द्वीपदियाँ

कुछ द्वीपदियाँ

1 : फितरत

छीन लूँ हक किसी का,
 ऐसी फितरत नहीं.
आईना जब भी देखा,
 खुशी ही हुई.**

2: नियति

नियत तो अच्छी थी,
पर नियति की नीयत बिगड़ गई *
जीवन के थपेड़े खाते- खाते
वह महलों से वृद्धाश्रम पहुंच गई *

3: इंसानियत

बाजार सज गए हैं...
चलो इंसानियत खरीद लाएँ ***

4: सामंजस्य
सामंजस्य नहीं था बिल्कुल
फिर भी जिन्दगी काट दी **
यह सोचकर कि
दुनिया क्या कहेगी.....**

5: जिन्दगी

कैसे कह दूँ कि जिन्दगी
कठिन से सरल हो गई है.
वक्त का असर तो देखो यारों...
अब तो 'सुधा' भी गरल हो गई है...

Saturday, 17 November 2018

एक और वनवास


~एक और वनवास~

ढूँढ रही थी अपने पिता की छवि
उस घर के  सबसे बड़े पुरुष में
एक स्त्री को माँ भी समझ लिया था
प्रेम की गंगा बह रही थी हृदय से मेरे
लगा था बाबुल का घर छूटा तो क्या हुआ
एक स्वर्ग जैसा घर फिर से ईश्वर ने मुझे भेट में दे दिया
एक बहन भी मिल गई है सुख दुख बाँटने को
सब कुछ यूटोपिया सा
फिर अचानक से मानो ख्वाब टूटा
शायद मेरा भाग्य था फूटा
एक खौफ सा मंडराता था शाम - ओ-  सहर
मेरे सामने था मेरे सुनहरे सपनों का खंडहर
संत का वेश धरे थे
कुछ रावण मेरे सामने खड़े थे
और उन सबका विकृत रूप
छीः कितना घिनौना और कितना कुरूप...

सपनों के राजमहल में
कैकेयी और मंथरा ने अपना रूप दिखाया था
सीता की झोली में फिर से वनवास आया था
फर्क इतना था कि इस बार
मंथरा दासी नहीं, पुत्री रूप में थी
और दशरथ थे  कैकेयी और
मंथरा के मोहपाश में..
हुआ फिर से वही जो
हमेशा से होता आया था
राम और सीता ने इस बार मात्र चौदह वर्ष नहीं,
अपितु जीवनभर का वनवास पाया था.
राम और सीता ने इस बार
आजीवन वनवास पाया था.

©®सुधा सिंह 🖋

Monday, 5 November 2018

मेरी प्रेयसी.... 💖हाइकू


मेरी प्रेयसी... 💖 हाइकू

1:
मन मंदिर
प्रेयसी का हमारी
प्रेम अमर

2:
उजला रंग
सुन्दर चितवन
छेड़े तरंग

3:
अपनापन
गोरी तू जताती
न सकुचाती

4:
मनभावन
लबों पर मुस्कान
तू मेरी जान

5:
चाँद सा मुख
आवाज़ में मिठास
हो सुखाभास

6:
गीतमाला तू
जीवन उजाला तू
प्रेमवर्षा तू

7:
 पास हो तुम
अहसास हो तुम
होश हैं गुम.

8:
मन की बात
प्यार भरी सौगात
रहा हूँ बाँट


सुधा सिंह 🦋 03.01.16

Thursday, 11 October 2018

ढल जा ऐ रात....




ढल जा ऐ रात...
मुझे सूरज को मनाना है
बहुत दिन हुए
न जाने क्यूँ...
मुझसे रूठा हुआ है...

Thursday, 20 September 2018

कान्हा.... ओ कान्हा..


तेरे काँधे पर सिर रखके सुकूं पाती हूँ.
 कान्हा,
 तुझमें इतनी कशिश क्यों है????

Wednesday, 19 September 2018

मना है...


न  दौड़ना मना है,   उड़ना मना है
न गिरना मना है , न चलना मना है!
जो बादल घनेरे, करें शक्ति प्रदर्शन
तो भयभीत होना, सहमना मना है!

पत्थर मिलेंगे, और कंकड़ भी होंगे.
राहों में कंटक, सहस्त्रों चुभेंगे!
कछुए की भाँति निरन्तर चलो तुम,
खरगोश बन कर, ठहरना मना है!

भानु, शशि को भी लगते ग्रहण हैं..
विपदाओं को वे भी, करते सहन हैं!
विधाता ने गिनती की साँसे हैं बख्शी..
उन साँसों का दुरुपयोग करना मना है!

गिरा जो पसीना, तो उपजेगा सोना.
लहू भी गिरे तो, न हैरां ही होना .
निकलेगा सूरज, अंधेरा छटेगा.
नया हो सवेरा , तो सोना मना है!!!

📝 सुधा सिंह 🦋 

Saturday, 1 September 2018

प्यारी मैं....



प्यारी मैं,
मेरी प्यारी प्यारी... मैं....

अरे.!अरे... !मुझे पता है तुम क्या सोच रही हो?
तुम सोच रही हो .. कि आज मुझे क्या हो गया है??
कैसी बहकी - बहकी बातें कर रही हूँ ??
आज तक तो मैंने तुम्हें कभी प्यारी नहीं कहा!!
कभी प्यार से पुकारा नहीं!!
हमेशा तुम्हारी अनदेखा करती रही!!!
फिर अचानक से मुझे क्या सूझी???
यही न???

मैं....

मांगती हूँ आज तुमसे हृदयतल से क्षमा..
अहसास हुआ है मुझे अपनी गलती का ...

मैंने की है तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी ..
तुम थी मेरे प्यार के लिए सदा से तरसी
मैं.. कैसे भूल गई कि..
तुम मेरी हो....
मेरी अपनी हो ..
मेरा ही तो फर्ज था कि मैं तुम्हें प्यार करूँ...
तुम्हें तुम्हारा हक दूँ!

अगर मैं ही तुमसे प्यार न करूंगी....
तो भला कोई और भी क्यों करेगा???

ज्ञात है मुझे ...
मैंने भी वही भूल की ...
जो लोग अक्सर किया करते हैं...
अपनी अनदेखी... अपनों की अनदेखी!!!!

किंतु जब  होता है अहसास!!!!
तब तक हो जाता है बहुत कुछ ह्रास!!!

निकल चुका होता है बहुत कुछ हाथ से
बिल्कुल मुट्ठी की रेत की भाँति!
अंत में रह जाता है खाली हाथ... बेबस,
निरीह.. असहाय ... हतबुद्धि!

तुम चाहो तो उठक बैठक कर लूँ....
अपने कान मैं पकड़ लूँ ....
यह गलती दोबारा न होगी ...
क्या, बस एक बार मुझे माफी दोगी??

कैसे भूल गई .. तुम मेरे बिना और...
मैं तुम्हारे बिना अधूरी हूँ!!!
अब से .. मेरा पहला लक्ष्य है तुम्हें पाना..
पहले तुम्हें पा लूँ, फिर निकलूं..
अपने अगले गन्तव्य की राह तय करने !!!!
एक बेहतरीन इंसान बनने !!!

परंतु, इस बार अकेली नहीं....मैं जाऊँगी तुम्हारे साथ !
 कहो ...  दोगी न सदैव............. तुम मेरा साथ???


📝सुधा सिंह 🖋

Thursday, 30 August 2018

कहना तो था पर..

कहना तो था पर कभी कह न पाई

सोचकर ये कि,
पड़ोसी क्या कहेंगे...
समाज क्या कहेगा....
दुनिया क्या कहेगी....
मैं कुछ कह न पाई!!!!

बांध दी किसी ने बेड़ियाँ जो पैरों में,
तो छुड़ाने की कोशिश भी न की.
उसे अपना नसीब समझ लिया!
नसीब से कभी लड़  न पाई! 
कहना तो था पर....

सदियों से लड़कियां चुप ही रही थी.
गाय की तरह चारदीवारी में खूंटे से बंधी थी.
आदत भी तो इसी परंपरा की थी.
फिर मैं कैसे ये परंपरा तोड़ देती!!
कैसे अपना मुँह खोल देती!!
मैं ये परंपराएं तोड़ भी न पाई.
मैं कुछ कह न पाई. 
कहना तो था पर....

चंचलता, कभी मेरी प्रकृति न थी.
कूप के मंडूक सी वृत्ति जो थी.
नदी की धार, बन बहने की प्रवृत्ति न थी.
अपने सागर में मिल न पाई!
मैं कभी कुछ कह न पाई! 
कहना तो था पर....

Saturday, 4 August 2018

अन्तरद्वन्द्व


अंतरद्वन्द्व

मेरी पेशानी , लंबी लकीरों से सजाते,
वक्त से पहले ही, जो मुझे बूढ़ा बनाते,

मेरे भीतर , ईर्ष्या - द्वेष  जगाते,
मुझे अक्सर, गलत पथ पर दौड़ाते,

रचते  साजिश सदा,
मेरे स्वजनों को, मुझसे दूर करने की
मेरे उसूलों से, मुझे डगमगा देने की

 दिन का चैन, रात का सुकून छीन लेने की
अष्टप्रहर कोल्हू का बैल समझ, मुझे जोते रहने की

मेरे सुनहरे पलों को, बड़ी बेदर्दी से मुझसे छीन लेने की
 बन अग्निशिखा अविराम, मेरे अंतर को सुलगाने की

आख़िर कौन है वो?????

वो लोभ है ..मृगतृष्णा वो ...
दिल चीख चीख़ है कहता ये ..

मस्तिष्क पर अभियोग चला
दिल देता उसको दोष सदा
नित अंतस... आर्तनाद करता
मेरा अंतस... आर्तनाद करता

मस्तिष्क भी, किंतु कम नहीं
नित प्रति दलीलें है देता  -
संभ्रांत शब्दों में है कहता ....

मंजिल अपनी पानी हो तो
की जाए जो ..है  साधना वो
वही पूजा... है अराधना वो

हूँ किंकर्तव्य विमूढ़ मैं ...
 है गलत कौन
और कौन सही!!!!!!
आपस में क्यूँ फूट है इतनी...
क्यूँ इनमें सौहार्द्र नहीं!!!!!!

कैसे एक की बात को मानूँ ?
कैसे किसी से रार मैं ठानूं?

किस पक्ष को विजयी कह दूँ मैं
औ... किसे कहूँ- वह हुआ पराजित
यह द्वंद्व सदा से जारी है.........!!!!

Monday, 28 May 2018

Quote - लम्हें जिन्दगी के

माँ भारती



1:गरिमा गान
माँ भारती महान
हमारी शान

2:खूबसूरत
जननी जन्म भूमि
तेरी मूरत

3:सारे जहाँ में 
सदा झंडा लहरे
तेरी शान में 

4: आग भरी हो 
भारतीय रगों में 
गद्दारी न हो

5:चाह है यही 
हो भारत से दूर 
भूख गरीबी 

6:माथे पे मेरे 
 तेरी माटी चमके 
 संझा सबेरे 

7:गाँधी बनूँ या 
सुभाष बन जाऊँ 
तो मोक्ष पाऊँ 

8:कर दे हम 
निछावर तुझी पे 
जान सनम 

9:जज्बा हमारा 
तिरंगे के नीचे हो 
संसार सारा