गुरुवार, 10 सितंबर 2020

गणपति स्तुति :दोहे


1:

यही मनोरथ देव है, रखिए हम पर हाथ। 

सुखकर्ता सुख दीजिए , तुम्हें नवाऊँ माथ।। 


 2:

प्रथम पूज्य गणराज जी, पूर्ण कीजिए काज।

सकल मनोरथ सुफल हों, विघ्न न आए आज।।


 3:

वक्रतुण्ड हे गजवदन , एकदंत भगवान 

आश्रय में निज लीजिए, बालक मैं अनजान। 

4:

रिद्धि-सिद्धि दायी तुम्हीं, दो शुभता का दान 

ज्ञान विशारद ईश हे , प्रज्ञा दो वरदान।। 

 


5:

हे देवा प्रभु विनायका, गौरी पुत्र गणेश।

प्रथम पूजता जग तुम्हें , दूर करो तुम क्लेश।। 


6:

मुख पर दमके है प्रभा, कंठी स्वर्णिम हार।

प्रभु विघ्न को दूर करो, हो भव सागर पार ।। 


7:

ज्ञानवान कर दो मुझे , माँगूँ यह वरदान।

शरण तुम्हारे मैं पड़ी, देवा कृपा निधान।। 


8:

दुखहर्ता रक्षक तुम्हीं, तुम हो पालन हार।,

पार करो भव मोक्षदा, तुम ही हो भर्तार ।। 


9:

मंगलमूर्ति कष्ट हरो, संकट में है जान ।

आयी हूँ प्रभु द्वार मैं , रखिए मेरा मान ।।

 

10:

हे गणपति गणराज हे, दर्शन की है प्यास 

देव मेरी पीर हरो,तुमसे ही है आस।। 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

कह दो न मुझे अच्छी

 


कह दो न मुझे अच्छी, 

यदि लगे कि अच्छी हूँ मैं 

तुम्हारे मुँह से, 

अपने बारे में, 

कुछ अच्छा सुन शायद 

थोड़ी और अच्छी हो जाऊँगी मैं, 

अपने जीवन में कुछ बेहतर, न न.. 

शायद बेहतरीन, कर पाऊँगी मैं 


बढ़ा दो न 

अपनी प्यार भरी हथेली मेरी ओर 

कि पाकर तुम्हारा सानिध्य, 

तुम्हारी निकटता, शायद 

निकल पाऊँ जीवन के झंझावातों से 

और गिरते - गिरते संभल जाऊँ मैं 


और दे देना, 

मुझे छोटा - सा, 

नन्हा- सा एक कोना अपने 

हृदय की कोठरी में कि 

कइयों जुबाने

मुझे लगती हैं, कैंची सी आतुर, 

कतरने को मुझे 

शायद तुम्हारे अंतस  का 

अवलंबन ही मुझे मनुष्य बना दे 


बोलो क्या कर सकोगे तुम, 

यह मेरे लिए, या, अपने लिए 

क्योंकि तुम में और मुझमें 

अंतर ही क्या है?? 

हो जाने दो, यह सम्भव 

वस्तुतः तुम्हारा मैं 

और मेरा तुम हो जाना ही 

तो प्रकृति है न 


यह समर्पण भाव ही तो 

मनुष्यता कहलाती है 

आओ तुम और मैं 

हम दोनों, 

आज से मनुष्य बन जाते हैं।




सोमवार, 24 अगस्त 2020

श्री गणेश स्तुति



हे गणपति, हे गणराया। 

समझ न पाए, कोई तेरी माया ।1। 

 

शिव पार्वती के, तुम हो दुलारे ।

 शीश पे सोहे, मुकुट तुम्हारे।2।


प्रथम देव तुम, पूजे जाते ।

पाँव तुम्हारे, नूपुर सुहाते ।3।


सारा जग करता, है तेरा ही वंदन ।

सह नहीं सकता, तू भक्तों का क्रंदन ।4।


डिंक मूषक की, तू करता सवारी।

कष्टों को तू, हरता हमारी ।5 ।


हे लंबोदर, हे बुद्धि दायी।

विनायका, है तू वरदायी ।6।


चंद्र भाल तेरे, खूब है सुहाता ।

गज वदना तू, भाग्य विधाता ।7।


सुर, मुनि, सज्जन, तुझको पूजे ।

तेरा ही नाम, इस जगती में गूँजे।8।


पिंगल नैना, वज्रांकुश है कर ।

धूम्र वर्ण शुचि , शुंड विशाल धर।9।


मुक्ता हार तेरे , कंठ में साजे। 

 सारे जग में तेरा, मंगल बाजे ।10।


छवि है तुम्हारी, अति मनभावन।

उद्भव तुम्हारा, है मंगल पावन।11।


रिद्धि और सिद्धि का, तू है स्वामी ।

कण - कण में, तू ही अन्तर्यामी ।12।


दूर्वा तुमको, अति मन भाए ।

वेश पीताम्बर, तुमको सुहाए ।13।


भादों चौथ का, जन्म तुम्हारा ।

सब दुखियों का, तू एक सहारा ।14।


आरती तेरी, प्रभु मैं गाऊँ ।

लड्डू और मेवा का, भोग लगाऊँ ।15।


पूरण इच्छा, तुम करते हो ।

आदि देव देवा , प्रणव तुम्हीं हो ।16।


शुभ और लाभ, तनय तुम्हारे ।

दाता तुम, हम दास तुम्हारे ।17।

 

मोदक तुझको, अति प्रिय देवा ।

करूँ दिन रात मैं, तेरी ही सेवा ।18।


एकदंता हे, चार भुजा धारी ।

आए हैं हम, शरण तुम्हारी ।19।


ज्ञानवान देवा , हमको बना दे ।

मग सच्चाई का, हमको दिखा दे ।20।









रविवार, 19 जुलाई 2020

कैसे भी हों हालात मगर...


कैसे भी हों हालात मगर ,
सफर अपना जारी रखो।
डगर में मुश्किलें आएंगी कई 
उनसे लड़ने की तैयारी रखो।1।

बढ़ते कदमों को रोकने वाले,
राह में मिल जायेंगे बहुत, 
जो आ सको काम किसी के, 
वो नीयत ,वो दिलदारी रखो।2।

पेट की आग इंसान को 
इंसान रहने देती नहीं,
बाँट लो अपनी रोटी का एक टुकड़ा उससे, खुद को स्वल्पाहारी रखो।3।

सियासत के इस खेल में, 
अपने और पराए ढूँढ पाओगे नहीं,
बस रह जाए साख सलामत अपनी, उतनी तो जानकारी रखो।4।

देखकर दुनिया का चलन 'सुधा ',   अब तो डर लगता है बहुत,
कहीं खत्म न हो जाए इंसानियत थोड़ी उसपे भी पहरेदारी रखो।5।






शनिवार, 11 जुलाई 2020

दोहे-वर्षा ऋतु



1:दादुर: 

दादुर टर- टर बोलते,बारिश की है आस। 
बदरा आओ झूमके, करना नहीं निराश।।
 
2 :हरीतिमा: 

वृक्ष धरा पर खूब हो,  भरे अन्न भंडार ।
हरीतिमा पसरे यहाँ, हो ऐश्वर्य अपार।। 

3:वारिद::

वारिद काले झूमके, करते जब बरसात। 
मोर पपीहा नाचते, हों आह्लादित पात।। 

4:चातक:

ताके चातक स्वाति को, होकर बड़ा अधीर। 
पीकर बूंदे स्वाति की , मिटती उसकी पीर।। 

5:दामिनी :

अम्बर चमके दामिनी, बचकर रहना यार। 
जो उसके मग में पड़े , करती उसपर वार।। 

6:कृषक :
*कृषक* उगाता अन्न है,रखता सबका ध्यान। 
रात दिवस उद्यम करे, मिले न लेकिन मान।। 

7:पछुआ :

जब समीर पछुआ बहे ,गर्मी तब बढ़ जाय। 
पानी की हो तब कमी, लू तन को झुलसाय।।

8:पावस :

तपन बढ़े जब ग्रीष्म से , आए *पावस* झूम। 
पशु पक्षी तब नाचते, मचे खुशी से धूम।। 

9:वृक्षारोपण :

वृक्षारोपण कीजिए, फिर होगा कल्याण। 
खिल जाएगी ये धरा, होगा सबका त्राण।।

10:बरसात :

माह सावन बीत गया,कृषक हुए हैरान। 
बूंद इक भी नहीं गिरी,घर में अन्न न धान।।