pankhudiya

Saturday, 17 August 2019

दर्द

पीड़ा
दर्द 



दर्द कहाँ सुंदर होता है

दर्द को भला कभी कोई अच्छा कहता है
दर्द सालता है 
दर्द कचोटता है, चुभता है
इसका रूप भयावह है

फिर दर्द को क्यों किसी को दिखाना

इसे छुपाओ तकिये में, गिलाफों में, 
किसी काली अँधेरी कोठरी में 
या बंद कर दो दराजों में 
ताले चाबी से जकड़ दो 
कि कहीं किसी  
अपने को दिख ना जाए
अन्यथा यह चिपक जाएगा उसे भी 
जो तुम्हें प्रिय हैं, बहुत प्रिय.. 

दर्द को छुपा दीजिए उसी तरह

जिस तरह घर में अतिथियों के आने से पहले छुपाए जाते हैं सामान 
अलमारियों के पीछे, कुछ खाट के नीचे, कि सब कुछ साफ़ सुथरा दिखना चाहिए
बिलकुल बेदाग.......
आडंबर का  पूरा आवरण ओढ़ लीजिए,  पहन लीजिए एक मुखौटा .....
कि यह दर्द बेशर्म है बड़ा 
उस नादान बच्चे की तरह...
जो हमारे सारे राज़ 
खोल देता है आगन्तुकों के समक्ष ...
और उसे भान भी नहीं होता 
दबा दीजिए उसे रसातल में, पाताल में या फेंक दीजिए उसे आकाश गंगा में ..
कि कहीं ये रूसवा न कर दे हमें
हमेशा- हमेशा के लिए... 





10 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना
    दर्द सालता है, कचोटता है फिर भी
    मजबूत बनाता है

    बधाई एक खूबसूरत रचना के लिये
    सादर

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    1. शुक्रिया.. बहुत दिनों के बाद हिम्मत की है कुछ लिखने की. वरना पापा के जाने के बाद मन टूट चुका था😔😔😔 🙏🙏🙏🙏

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  2. दर्द कहाँ सुंदर होता है
    दर्द को भला कभी कोई अच्छा कहता है
    दर्द सालता है
    दर्द कचोटता है, चुभता है
    इसका रूप भयावह है... बेहद हृदयस्पर्शी रचना

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    1. शुक्रिया अनुराधा जी 🙏 🙏 🙏

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  3. वाह सुधा जी दर्द को छिपा दीजिए उसी तरह जिस तरह घर में अतिथियों के आने से पहले छुपाए जाते हैं सामान आलमारी के पीछे खाट के नीचे ,अक्सर ऐसा ही होता है ,अपने दर्द की नुमाइश करके कोई फायदा नहीं होता उल्टा हंसी और व्यंग का पात्र ही बन्ना पड़ता है ,और कहते भी है ना रोने वाले के साथ कोई नहीं रोता हंसने वाले के साथ फिर भी सब हंस लेते हैं
    सुन्दर प्रस्तुति सुधा जी

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया 🙏🙏🙏😘

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (19-08-2019) को "ऊधौ कहियो जाय" (चर्चा अंक- 3429) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. सुधा दी, सही कहा आपने कि दर्द को छुपाना ही पड़ता है। चाहे उसका रूप कोई भी हो। सुंदर प्रस्तूति।

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  6. भावपूर्ण रचना...

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