Monday, 19 June 2017

बेचारा बछड़ा

देख रही हूँ आजकल कुछ नए किस्म की गायों को
जो अपने नवजात बछड़े की
कोमल काया को
अपनी खुरदुरी जीभ से चाट चाट कर लहूलुहान कर रही है!
इस सोच में कि वह उन पर प्यार की बरसात कर रही है!
उनपर अपनी ममता लुटा रही है उन्हें सुरक्षित महसूस करा रही है!
पर इस बात से अनजान कि
वह खुद ही अपने बच्चे को कमजोर बना रही है!
इस बात से अनजान कि बछड़े के शरीर से
रक्त श्राव हो रहा है धीरे धीरे!
वह रक्त कोई और नहीं,
माँ ही पी रही है धीरे धीरे!
     
माँ का स्पर्श पाकर बछड़ा मगन था!
वह से उससे इतना जुड गया था कि उसे दर्द का एहसास भी नहीं होता था!
एहसास थाउसे माँ के प्रेम का, दुलार का,
पर बेखबर था अपनी कमजोर होती काया से!

बछड़ा धीरे धीरे बड़ा तो हो गया पर
अपने पैरों पर खड़ा होना सीख न पाया, चलना सीख न पाया.
वह मां की ममता तले इतना दब गया कि
 वह दुनिया का सामना करने लायक
न बन पाया, वह निर्बल था.

उसका इतना जतन हो रहा था!
कि जाने अनजाने कब उसका पतन हो गया, पता ही नहीं चला.
बेचारा बछड़ा....


Monday, 5 June 2017

धरती की पुकार

पाताल में समाने को बेताब है धरा।
आँखों में करुणा विगलित अश्रु है भरा।
हृदय से उसके निकलती एक ही धुन।
हे मनुज, मेरी करुण पुकार तो सुन..

"तूने ऐसे कर्म किए!
बचा नहीं कुछ भविष्य के लिए!
जो कुछ मैंने तुझे दिया!
गलत उसका उपयोग किया!

थी मैं कभी नई दुल्हन - सी!
 हो गयी आज जर्जर, गुमसुम - सी!
मेरी अंतिम साँस भी उखड़ रही है!
हालत प्रतिदिन बिगड़ रही है!

मुझको न तू इतना सता!
मुँह खोल और यह तो बता!
माता पुत्र का क्या  है नाता !
क्या ये तुझको नहीं पता !

क्या मैं तेरी माँ नहीं!
या तू मेरा पुत्र नहीं!
मेरी ऐसी हालत है!
पर तुझकॊ कोई फिकर नहीं!

मैंने कई इशारे किए!
कहीं सुनामी, कहीं जलजले!
और कहीं भूकंप दिए!

पर तुझकॊ समझ ना आया है!
घमंड अभी भी छाया है!

हो चुका है अब तू  हृदयहीन!
मैं भी हो गई हूँ सबसे खिन्न!
मन तो ये करता है मेरा!
कर दूँ तुझकॊ छिन्न भिन्न!

हो गई हूँ अब मैं भी क्रूर!
तूने कर डाला मजबूर!
छाया है जो तुझे गुरूर!
करूंगी उसको चकनाचूर!

अब मैं तुझको बतलाउंगी!
सबक तुझे मैं सिखलाउंगी!
अब मैं जीना छोड़ दूँगी!
तुझकॊ भी अब ले डूबूंगी!"




Sunday, 21 May 2017

मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!

मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?

वो पेड़ो पर चढ़ना, गिलहरी पकड़ना,
अमिया की डाली पर झूले लगाना,
वो पेंगें मारके  बेफिकरी से झूलना,
वो मामा और मासी का मनुहार करना,
मेरे रूठ जाने पर मुझको मनाना,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!

खिलौनों की खातिर वो रोना मचलना,
वो छुप्पन छुपाई, वो रस्सी कुदाई,
वो गुड़िया और गुड्डे की शादी रचाना,
साखियों के संग मिलके ऊधम मचाना,
वो कट्टी, वो बट्टी , वो रूठना मनाना,
वो परियों के किस्से, वो झूठी शिकायत,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!

लगोरी का अड्डा, वो गिल्ली, वो डंडा,
वो भवरों का चक्कर, वो कंचे छुपाना,
वो खेतों में जाना, वो इमली चुराना,
वो मिट्टी सने तन लेके चुपके से आना,
न खाने की चिंता, न सोने की फिक्र,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!

वो राजा, वो रानी, वो चोर और सिपाही,
वो बारिश के पानी में नावें चलाना,
वो रास्ते पर साइकिल के टायर दौड़ाना,
तितली की पूँछ में वो धागा लगाना,
वो विक्रम बेताल, चाचा चौधरी और साबू,
पाने फिर इनको कहाँ जाइये?
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!

वो शोखी, शरारत , वो भूली - बिसरी बातें,
वो अल्हड़पन, वो मासूमियत पुनः चाहिए!
हाँ..
मुझे मेरा बचपन पुनः चाहिए!

सुधा सिंह 🦋