Monday, 20 March 2017

एक परिणय सूत्र ऐसा भी...

 साथ रहते -रहते  दशकों बीत गए
पर न् मैंने तुम्हे जाना,
न् तुम् मुझे जान पाए।
फिर भी एक साथ एक छत के नीचे
जीए जा रहे है।
क्या इसी को कहते हैं परिणय सूत्र ?
नही यह केवल मजबूरी है...

तुम्हे भले नही , पर मुझे मेरा एकाकीपन नजर आता है।
यह एकाकीपन मुझे
सर्प की मानिंद डसता है!

जीवन् में तुमने क्या खोया क्या पाया
ये तुम्हे ही पता है ।
मुझे तुमने अपने जीवन का अंग नही बनाया ये मुझे पता है।

तुम्हारे काम का फल तुम्हे क्या मिलता है ये तुम्हे पता है।
पर तुमने  मुझे क्या दिया है
ये मुझे पता है।

यह मजबूरी नहीं तो और क्या है

तुमने तो केवल डराया है, धमकियां दी है।
और मैंने उन धमकियों को जहर की घूँट की तरह पिया है।
अपना कर्म करते करते तुम्हारे साथ एक अरसा जिया है।

अरे ओ संगदिल कभी तो सोचो ,
 क्या लाये था क्या ले जाओगे ?
जब् किसी को प्यार दोगे ,
तभी तो प्यार पाओगे !

मुझे जानने का एक बार प्रयास तो करो
मैं संगीनी हूँ तुम्हारी  ,
घर की सजावट का कोई  सामान नहीं।
गर्व और घमंड हूँ तुम्हारा
कोई गाली या अपमान नही।

 मजबूरी नहीं, एक स्वछंद जीवन की चाह है मुझे
 साथी बनना है तुम्हारा
क्योंकि प्यार तुमसे अथाह है मुझे....


( हमारे देश  में बहुत से परम्पराये ऐसी है जो सदियों से समाज को अपने मायाजाल में जकड़े हुए हैं।उनमे से एक यह भी है -जब् पति पत्नी में प्यार न् हो और वे समाज के रीती रिवाजो और बंधनो में उलझकर मजबूरी में एक दूसरे के साथ जीवन बिताने को विवश  होते हैं।जहाँ घर का मालिक और कर्ता धर्ता पति होता है और पत्नी केवल घर में सजाने की वास्तु मानी जाती है अथवा वह घर सँभालती है। उसे निर्णय लेने का कोई हक़ नही दिया जाता। इन पंक्तियों में उस स्त्री की दशा को दर्शाने का प्रयास किया है मैंने। )



©सुधा सिंह
चित्र :गूगल साभार

Sunday, 19 March 2017

अपनापन





दादा दादी को पोते पहचानते नहीं
नाना नानी को नवासे अब जानते नहीं

न जाने कैसा  कलयुगी  चलन है ये
कि रिश्ते इतने बेमाने हो गए!
 और ताने  बाने  ऐसे  उलझे
कि अपने  सभी बेगाने  हो गए!

प्यार  अनुराग  और  स्नेह  के  बंधन  पर आज
कैसी  गिरी है  गाज!
कद्र  रिश्तो की  सबने बीसराई  है  आज!

न  भाव  है  सम्मान  का, ना   कोई लिहाज है !
सभ्यता  पश्चिमी ऐसी हावी हुई, कि
बढ़ी है दूरियां और  बदला बदला सबका मिजाज  है !

परिचित भी अब अपरिचित से जान पड़ते हैं
अतिथि अब भगवान नहीं यमराज से लगते हैं
"जैसे तैसे पीछा छूटे" मन में ऐसे विचार उठते हैं!
न जाने क्यों लोग दूसरों से इतना कटे कटे से रहते हैं!

 लोगों के  दिलों में  अब  प्यार के फूल  कहाँ  खिलते हैं!
रक्षाबंधन भाईदूज जैसे  पर्व  भी अब  बोझ  से  लगते हैं!
मात्र खानापूर्ति की  खातिर  सब आकर  इस दिन मिलते हैं!
पर जीर्ण हुए  नाते  कब और कहां सिलते हैं!

बूढों और पुरखों की बोली क्यों हो गई है  मौन!
दादी नानी की  कहानी अब भला सुनता है  कौन?
परिवारों में ये कैसा एकाकीपन है!
दूर रहकर भी कितनी अनबन है!

अहंकार और दौलत की बलि चढ़ते इन रिश्तों को आखिर संजोएगा कौन?
लगातार गहरी होती इन खाइयों को आखिर भरेगा कौन?

शुरुआत कहीं से तो करनी होगी!
कदम पहला किसी को  उठाना होगा!

वरना इस धरा पर 'अपना' बचेगा कौन!

©सुधा सिंह








Saturday, 11 March 2017

रिज़ल्ट का दिन..


सिया की मेहनत का आज गुणगान हो रहा है!
रिया की  कोशिशों का भी खूब बखान हो रहा है!

जहाँ प्रथम का चेहरा खुशी से लाल हुआ जा रहा है!
वही शुभम आज मां से आखें  चुरा रहा है!

ओम ने बाजार से खास मिठाइयां लाई हैं!
पर सोम के घर में खामोशी-सी क्यों छाई है?

खुशियों और गम का ये कैसा संगम है!
कहीं उदासी और मायूसी के सुर,
तो कही आनंद की सरगम है!

लग रहा है जैसे युद्ध का दिन है!
नहीं!........
आज तो रिज़ल्ट का दिन है!

दीपक आगे की कठिन पढ़ाई से घबरा रहा है!
सवालो का बवंडर  मन में भूचाल - सा उठा रहा है......

गणित के सवाल क्यों भूत बनकर मुझे इतना सताते हैं!
अकबर और बाबर मुझे नींद में भी डराते हैं!

अब पड़ोसी अपनी बेटी के प्रथम आने पर ख़ूब इतराएंगे!
पढ़ाई के नये नये टिप्स मुझे बताएंगे!

आगे क्या होगा?
पापा की झिड़की मिलेगी, उनका दुलार होगा?
या मूड उनका फिर से खराब होगा?
छोटी के प्रश्नों का आखिर मेरे पास क्या जवाब होगा?

आज वार्षिक कर्मफल का दिन है!
मन की कशमकश और उथल- पुथल का दिन है!

आज तो रिज़ल्ट का दिन है!
सच ही तो है ! आज युद्ध का दिन है!


©सुधा सिंह



Tuesday, 7 February 2017

कलयुग या झूठ युग?

भागती रही जिससे मैं हमेशा!
जिससे हमेशा लड़ती रही!
वही झूठ न जाने क्यूँ मुझे अपनी ओर खींच रहा है!

क्यूँ अब मुझे वही सच लगने लगा है!
क्यूँ यह झूठ चीख चीख कर मुझसे कहता है  कि
हर ओर आज उसी का बोलबाला है!
वही आज की सच्चाई है!
 
क्यूँ वह पूछता है  मुझसे...
कि आखिर..
इस सच से तुझे मिला ही क्या है?
सच ने तुझे दिया ही क्या है?

इस प्रश्न ने मुझे मूक कर दिया!
और सोचने पर मजबूर कर दिया!
ये कलयुग है या झूठ युग  है!
क्या  सचमुच ..
सच आज दुर्बल हो गया है!
क्या सच का साथ  छोड़  दूँ और
झूठ का दामन थाम लूँ

आखिर.. दुनिया यू ही तो दीवानी नहीं झूठ के पीछे!

ठीक ही  तो है...
सोच रही  हू  कि..  झूठ  ही  कहूँ  और  झूठ  ही लिखूं ..
लिखूं
कि शिक्षक  हूँ.. फिर भी  खूब अमीर हूँ!
अपने  लिए समय ही समय  है मेरे पास!
लिखूं  कि  एक बहुत  अच्छी  जिन्दगी  जी  रही  हूँ
लिखूं  कि सच  का साथ  देकर..
मैंने  बहुत कुछ पाया है!
लिखूं  की शिक्षक हूँ कोई  गुलाम  नहीं!
लिखूं कि  इस युग मे भी विद्यार्थी  अपने शिक्षको  को मान-सम्मान  देते हैं!
लिखूं  कि मैंने अपने बच्चो को  वो  सब  दिया है जो  धनाढ्य  घरों के  बच्चों को आसानी से  मिल जाता है!
लिखूं  कि मेरे  बच्चे  किसी  मामूली सी  वस्तु के लिए  तरसते  नहीं है!
लिखूं की मेरा परिवार  मेरे  पेशे  से खुश हैं!सोच रही हूँ कि आखिर क्या क्या  लिखूं  और  क्या क्या  कहूँ क्या  क्या  छोड़ूं?

 क्या  सचमुच  दिल से यह सब कभी लिख  पाऊँगी!
क्या सचमुच झूठ को अपना पाऊँगी!
नहीं..
यह मुझसे  नहीं हो पाएगा!
कभी नहीं हो पाएगा!


सुधा सिंह

Saturday, 31 December 2016

जिंदगी-तेरी आजमाइश अभी बाकी है!

जिन्दगी ...
तेरी आजमाइश अभी बाकी है,
मेरे ख्वाब अभी मुकम्मल कहाँ हुए?

मेरी फरमाइशें अभी बाकी है ।
कई ख्वाहिशें अभी बाकी हैं।

माना कि ..
दूसरों की भावनाओं से खिलवाड़ करना,
तेरी आदत में शुमार है।
पर मुझे तुझ पर बेइंतहां ऐतबार है।

तू कभी किसी को जमींदोज करती है ,
कभी आसमां की बुलंदी तक पहुँचाती है।
कभी मौत के दर्शन कराती है,
तो कभी जीवन के सुनहरे सपने दिखाती है।

किसी  को रुलाती है
किसी को गुदगुदाती है ।
तेरी मर्जी हो, तो ही ,
लोगों के चेहरों पर मुस्कान आती है।

कभी इठलाती, बलखाती ,शरमाती- सी सबके दिलों में घर बनाती है।
जब विद्रूपता की हद से से गुजरती है, तो लोगों को सदा के लिए मौन कर जाती है।

जिंदगी ..
अभी तुझसे बहुत कुछ सुनना
और तुझे सुनाना बाकी है ।
क्योंकि तू  कैश नहीं ,चेक है ।
तुझे भुनाना बाकी है।

जिंदगी
तेरा हसीन रूप ही अच्छा है।
तू हमें किसी जंजाल में उलझाया न कर।
तू दोस्त बनकर आती है तो सबके मन को भाती है।
यूँ हमें अपनी सपनीली दुनिया से दूर न कर।

भूलना मत..
मेरी फरमाइशें अभी बाकी है ।
कई ख्वाहिशें अब भी बाकी हैं।

Thursday, 29 December 2016

माना कि मंजिल दूर है....




माना कि मंजिल दूर है,
पर ये भी तो मशहूर है.....

मजबूत इरादे हो अगर,
पाषाण भी पिघला करते है।
दृढ निश्चय कर ले इंसाँ तो,
तूफ़ान भी संभला करते हैं।

हौसले बुलंदी छुएं तो ,
नभ का मस्तक झुक जाता है।
जब साहस अपने चरम पे हो ,
तो सागर भी शरमाता है।

मुश्किलें बहुत सी आयेंगी,
तुझे राहों से भटकायेंगी।
मंजिल पाना आसान नही,
ये कमजोरों का काम नही।

बैरी षणयंत्र रचाएंगे,
शत्रु भी आँख दिखाएंगे।
भयभीत न हो, तू युद्ध  कर।

आलस आवाजें देगा तुझे,
मस्तिष्क तुझे भरमायेगा।
मुड़कर पीछे तू  देख मत,
बस निकल पड़।

रुक गया तो तू पछतायेगा,
तेरे हाथ न कुछ भी आएगा।
अनजान डगर ,अनजान सफ़र,
ले कस कमर और राह पड़।

'मांझी' की हिम्मत के आगे,
पर्वत ने घुटने टेके थे।
उस मांझी को तू याद कर ।
बस लक्ष्य साध और गति पकड़।

हर बाधा को पार कर, तू आगे बढ़।
बस आगे बढ़.....


Saturday, 17 December 2016

ये झुर्रियाँ..।


ये झुर्रियाँ..।


ये झुर्रियाँ मामूली नहीं,
ये निशानी है अनुभवों की।
इन्हें तुम अपना अपमान न समझो
कोने में पड़ा कूड़ा नहीं ये,
इन्हें घर का मान और सम्मान समझो।

हर गुजरे पल के गवाह है ये,
इन्हें  बेकार  न समझो।
चिलचिलाती धूप में छांव है ये,
इन्हें अंधकार न समझो।

ये पोपले चेहरे कई कहानियां कहते है,
सीख लो इनसे कुछ।
इन्हें पुराना रद्दी  या अख़बार न समझो


उंगली पकड़ कर चलना सिखाया था जिसने  कभी ,
इन्हें अपनी राह का रोड़ा, कभी  यार न समझो।

मिलेगा प्यार और दुलार, इनके पास बैठो ।
इन्हें सिर्फ झिकझिक और तकरार न समझो।


बूढी लाठी जब चलती है, अपनो से ठोकर खाती है।
बन संबल इनके खड़े रहो ,
इन्हें धिक्कार न समझो।

माना कि बूढ़े ,कपकपाते हाथों में, अब वो जान नहीं ।
पर  जब उठेंगे ,देंगे ये आशीष ही, हर बार समझो।

ये हमारी पूँजी हमारी धरोहर है
इन्हें संभालो ,इन्हें संजोओ,
इन्हें धन दौलत से नहीं,
बस तुम्हारे प्यार से सरोकार है समझो।

डूबता ही सही, पर याद रखो सूरज हैं ये
ढलेंगे तब भी आकाश में ,
अपनी लालिमा ही बिखेरेंगे याद रखो।







Monday, 5 December 2016

यदा- कदा....



1:
पास होकर भी ,
तेरे पास होने का, 
अहसास नही होता।
न् जाने ये कैसी दूरी है ,
हम दोनों के दरमियाँ।
2: 
दिल तोड़ना और साथ छोड़ना 
तो ज़माने का दस्तूर है ऐ दोस्त।
कायल तो हम तुम्हारे तब होंगे , 
जब् तुम् साथ देने की कला सीख लोगे ।
3:

अपनों को ठुकराना ,
गैरों को अपना बताना 
और इस बात पर इतराना
कि जहाँ में चाहने वाले बहुत हैं तेरे।

ऐ दोस्त,
क्या तू इतना भी नही जानता
कि हाथी के दाँत खाने के और 
दिखाने के और होते हैं।




Friday, 4 November 2016

सूरज फिर निकलेगा ,फिर चमकेगा।

संध्या चाहे कितनी भयावह क्यों न् हो।
सूरज फिर निकलेगा ,फिर चमकेगा।

संध्या तो संध्या है जब्  भी आती है
अपने साथ काली स्याह रातों
का पैगाम  ही लाती है
और सबके खुशनुमा जीवन में
भयावह अँधेरा
और गमगिनियां भर जाती है।
अपना विद्रूप
और अभद्र रंग दिखाती है।
कृष्ण पक्ष में तो और भी घनघोर हो जाती है।

पर सूरज क्योंकर डरेगा,
वह फिर निकलेगा ।
अपनी सुन्दर रश्मियों से
प्राकृतिक सुषमा को बढ़ाएगा।
सृष्टि को साक्षी मानकर अपने शौर्य को फिर प्राप्त करेगा।
अर्णव की बूंदें भी नया उल्लास  भरकर हिलोर मारेंगी।
और  एक नया जोश भरकर सबको सुधापान कराएंगी।
मदमस्त बयार अपना राग अलापेगी।
पक्षी अपना नितु नृत्य पेश करेंगे।

और तब संध्या और स्याह भयावह रात्रि को सती  होना पड़ेगा।
क्योंकि
सूरज फिर निकलेगा।


तलाश

तलाश

कुछ समझ नही आता जिंदगी....
तेरी गिनती दोस्तों में करूँ
या दुश्मनों में !

चिड़ियों की मानिंद दर रोज,
घोंसलों से दाने की खोज में निकलना।
फिर थक हार कर,
अपने नीड़ को वापस लौटना।
क्या केवल इसे ही नियति कहते हैं।
क्या केवल यही जिंदगी है।
आखिर तेरे कितने रंग हैं!

पर,

ऐ जिंदगी...

अब बहुत हो चुका.......

मैं अपने लिए थोड़ा वक़्त चाहती हूँ।
मैं थोड़ा सुकून चाहती हूँ
खुद को तलाशना चाहती हूँ।
खुद को पाना चाहती हूँ।

©सुधा सिंह~~