Friday, 21 August 2015

हर क्षण जीती हूँ मैं।


हर क्षण जीती हूँ मैं।

ज़र्रा ज़र्रा बिखरती हूँ मैं,
ज़र्रा ज़र्रा सिमटती हूँ मैं,
न जानू मैं  ,
कैसी कसक है ये !
न जानू मैं  ,
कैसा ये अहसास है!
क्षण- क्षण मेरी हस्ती ही
मुझे देती है चुनौती,
हौसले में दम और
उखड़ती सांसों में भरके प्राण ,
प्रतिपल जीवन से लड़ती हूँ मैं।
हर कसौटी को पार करती,
निराशा को मात देती ,
आशा को साथ लिए चलती हूँ मैं।
 हाँ ! हर क्षण जीती हूँ मैं।