Tuesday, 17 November 2015

तकदीर

कैसी तेरी कलम थी ,कैसी तेरी लिखावट!
पन्ना भी चुना रद्दी,स्याही में थी मिलावट!
अक्षर हैं बड़े भद्दे ,न है कोई सजावट!
धरती बनाई ऐसी ,कि हर जगह बनावट!

लिखने का मन नहीं था,
तो क्यों लिखी तकदीर मेरी।
किस बात का बदला लिया,
क्यों मेरे विरूद्ध चाल चली।
ऐसा दिया जीवन मुझे कि,
रूह तक मेरी जली।
हुआ तू 'परमपिता' कैसे
तुझसे तो सौतेली माँ ही भली।

मुन्नी है मेरी भूखी, मुन्ना न गया स्कूल।
बदन पे नहीं चिथड़े ,पैरों में चुभे शूल।
दो जून की रोटी नहीं,जलता नहीं है चूल्ह।
क्यों पैदा करके हमको ,ये रब तू गया भूल।

संघर्ष भरा जीवन ,और कष्ट हैं अनेक।
हर युग में तू आया ,यहाँ कलयुग में आके देख।
रावण ही नहीं कंस भी ,अब मिलेंगे अनेक ।
ऐसे जहाँ में जीकर ,फिर एक बार देख ।

हर जगह ठोकर यहाँ , है हर तरफ अपमान।
 है घूँट ये जहरीला, पीना नहीं आसान।
न उम्मीद की किरण है ,न सुख की कोई आहट।
न प्यार की खनक है ,न कोई सुगबुगाहट।

कहते है तेरे घर में, अंधेर नहीं है
देर है भले ही , हेर - फेर नहीं है
बालक हूँ तेरा ,जिद है मेरी, अब तो मुझे देख।
हाथों मेरे खींच दे ,सौभाग्य की एक रेख।

बस आखरी इल्जाम, मैंने तुझको  दिया है।
 दिल से हूँ क्षमाप्रार्थी ,गर  पाप किया है।