रविवार, 15 नवंबर 2015

इंतज़ार



अपने ज़ज़्बातों का
 इजहार करुं किससे!
कौन है वह ,कहाँ है वह,
अपना कहूँ किसे!
वो आसपास कहीँ
 नजर आता नहीं।
उसका पता भी
कोई बतलाता नहीं।

इक उम्र गुजार दी हमने,
करते जिनका इंतज़ार ।
न जाने वो घडी कब आएगी ,
कि होगा मुझे दीदारे - यार ।

आँखों से अश्क सूख गए,
राह उनकी तकते - तकते।
लबों से लफ़्ज रूठ गये,
इंतजारे मोहब्बत करते- करते।

अब ये आलम है कि,
मेरा अक्स मुझे दिखता नहीं।
कहीँ देर इतनी
न हो जाये कि
मेरी रूह मेरा साथ छोड़  दे।

सुधा  सिंह 🦋



शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

उस घडी का इंतजार मुझे अब भी है। (एक प्रतीकात्मक कविता)



उस घडी का इंतजार मुझे अब भी है।

चाहत तो ऊँची उड़ान भरने की थी।
पर पंखों में जान ही कहाँ थी!
उस कुकुर ने मेरे कोमल डैने
जो तोड़ दिए थे।
मेरी चाहतों पर ,
उसके पैने दांत गड़े थे।
ज्यों ही मैंने अपने घोंसले से
पहली उड़ान ली।
उसकी गन्दी नज़रे मुझपर थम गई।
वह मुझपर झपटने की ताक में
न जाने कब से बैठा था।
न जाने कब से ,
अपने शिकार की तलाश में था।
उसकी नजरों ने,
न जाने कब मुझे कमजोर कर दिया।
डर के मारे मैं संभल भी न पाई ।
पूरी कोशिश की ,
पर जमीन पर धड़ाम से आ गिरी।
फिर मेरा अधमरा शरीर था
और उसकी आँखों में जीत की चमक।
वह कुकुर अपनी इसी जीत का जश्न
रोज  मनाता है।
और अपनी गर्दन को उचका -उचकाकर
समाज में निर्भयता से घूमता है।
मानो उसने कोई विश्वयुद्ध जीत लिया हो।
उसके कुकुर साथी भी ,
इस कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
और कमजोरों पर ,
अपनी जोर आजमाइश करते हैं।
न जाने ऐसे कुकुरों के गले में ,
पट्टा कब पहनाया जायेगा !
तन के  घाव भले ही भर गए हैं,
आत्मा पर पड़े घाव कब भरेंगे !
क्या वो दिन कभी आएगा कि,
मैं दोबारा बेख़ौफ़ होकर
अपनी उड़ान भर पाऊँगी !
अपने आसमान को
बेफिक्र होकर छू पाऊँगी!
उस दिन-उस घडी का इंतजार
मुझे अब भी है।

शनिवार, 19 सितंबर 2015

सेल्फ़ी के साइड इफ़ेक्ट

आया है जमाना सेल्फी का ,
और  लोग स्वयं में मस्त है।
ऐसा क्रेज कभी न देखा,
ये क्रेज  बड़ा जबरदस्त है।

बच्चे का जब जनम हुआ ,
तब डॉक्टर ने सेल्फी ले डाली।
देश विदेश में भ्रमण किया,
लगे हाथ सेल्फी ले डाली।

सेल्फी ली ऊँचे गुम्बद चढ़,
सेल्फी ली पहाड़ के शिख पर।
हो जन्मदिवस या पुण्यतिथि,
सेल्फी ली खूब बढ़ चढ़कर।

पति मरा सेल्फ़ी ले डाली,
बम फूटे सेल्फ़ी ले डाली।
सांप के संग सेल्फी की खातिर ,
जान यमराज के हाथ में डाली।

एक निरा सेल्फी की खातिर ,
पार्लर जाओ खूब सज धज लो।
समय बिताना संग अपनों के,
यह दृश्य हुआ अदृश्य समझ लो।

सेल (cell )को अपना मित्र बनाकर,
सेल्फी ली पोस्ट कर डाली।
कोई मौका छूट न पाया,
हर मौके सेल्फी ले डाली।

मंदिर जाओ मस्जिद जाओ,
जाओ चर्च और गुरद्वारे।
किसकी किसको फिक्र यहाँ है,
सेल्फी में सब मस्त हैं प्यारे।

सेल्फी से प्यार हुआ इतना,
कि युवा देश का भरमाया।
आधुनिक बनने की चाह में,
अपना चैन -सुकून गँवाया।

'सेल्फी वेल्फ़ी' छोड़ दो भैया,
मन को अपने मत भरमाओ।
यह  काम निरर्थक इसे छोड़ दो,
दिल से अपना फ़र्ज़ निभाओ।


सुधा सिंह