Tuesday, 16 February 2016

मेरी प्रेरणास्रोत



मेरी प्रेरणास्रोत

कहते हैं कि हर मनुष्य अपना कर्म पूरा करने के लिए धरती पर जन्म लेता है परंतु कुछ ही ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें इस बात का भान होता है और जिन्हें इसका भान नहीं होता वे भौतिकवादी हो जाते हैं।अपनी रोजमर्रा की वस्तुएं जुटाने में ही अपना पूरा जीवन बिता देते हैं।उन्हें अपने और अपने परिवार के सिवाय कुछ और नज़र ही नहीं आता।कई बार तो मनुष्य इतना स्वार्थी हो जाता है कि वह अपने माता -पिता व भाई -बहनों से भी  किनारा कर लेता है ।ऐसे स्वार्थी जगत में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने कर्तव्यों को सबसे अधिक महत्व देते हैं।मैं बात कर रही हूँ एवलौन हाइट्स अंतर्राष्ट्रीय विद्यालय की मैनेज़िंग डायरेक्टर कमलेश शर्मा की,जिन्हें लोग प्यार से 'सिमी मैम' कहकर पुकारते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।वे  छात्रों को देश का कर्णधार समझती हैं।सिमी मैम एवलौन स्कूल से जुड़े हर व्यक्ति को अपने घर के सदस्य की तरह मानती हैं।जो कोई भी उनसे एक बार मिल लेता है वह उनका कायल हो जाता है।उनकी दूरदर्शिता व उनकी सूझबूझ ही एवलौन को एवलौन बनाती है।
   इस स्कूल में विद्यार्थियों को एकदम घर जैसा माहौल मिलता है इसलिये यहाँ कक्षाओं को कक्षा नहीं अपितु 'होमरुम'के नाम से पुकारा जाता है जिसका हिन्दी में अर्थ होता है-घर का कमरा और क्लास टीचर 'होमरूम टीचर'कहलाती है।यहाँ का वातावरण बच्चों को इतना पसंद है कि बच्चों को कभी घर जाने की जल्दी नहीं होती।हर छात्र पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है।उनकी प्रतिभाओं को निखार जाता है।उनकी छोटी से छोटी गतिविधि पर शिक्षिकाओं की बारीक़ नज़र  रहती है।बच्चों की हर छोटी बड़ी सभी समस्याओं का समाधान किया जाता है।यह सब सिमी मैम के मार्गदर्शन से होता है।यहाँ छात्रों को बेहतर जीवन जीने के गुर सिखाये जाते हैं।छात्रों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया जाता बल्कि उन्हें प्रैक्टिकल (व्यावहारिक) ज्ञान भी दिया जाता है।साथ ही साथ जीवन मूल्य भी सिखाये जाते हैं।
   सभी बच्चे सिमी मैम को अपने आदर्श के रूप में देखते हैं।सिमी मैम का नाम सुनते ही बच्चे - बच्चे के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान फ़ैल जाती है।वे स्कूल के हर बच्चे को अपने बच्चे की तरह समझती हैं।प्रत्येक बच्चे का नाम उन्हें बखूबी याद रहता है।
    बच्चों का सर्वांगीण विकास उनका प्रमुख उद्देश्य है।अतः स्कूल में प्रतिदिन सुबह 15 मिनट का ध्यान व मैडिटेशन करवाया जाता है जिससे छात्र के मानसिक विकास के साथ साथ आत्मिक विकास भी संभव हो सके और वह देश का एक सच्चा नागरिक बनकर देश के विकास में अपनी भूमिका तय कर सके।उनके मार्गदर्शन में ही विद्यालय में मौन कालांश अर्थात साइलेंट आवर की शुरुआत की गई ।उनका मानना है कि कक्षा में बिना बोले भी पढ़ाया जा सकता है और शिक्षण की यह विधि बेहद कारगर सिद्ध हुई है।इस प्रकार छात्र व शिक्षिकाएँ एक दूसरे से बिना बोले क्रमशःसीखते और सिखाते हैं और पठन पाठन की इस प्रक्रिया का आनंद लेते हैं।
 इसी स्कूल में मैं  शिक्षिका के पद पर कार्यरत हूँ और स्वयं को धन्य मानती हूँ कि मुझे स्कूल की डायरेक्टर के रुप में सिमी मैम का सानिध्य प्राप्त है।कई बार मन में यह भी विचार आता है कि काश.....मुझे भी इस विद्यालय में एक विद्यार्थी के रूप में पढने का सुअवसर प्राप्त हुआ होता।मैं ही नहीं इस विद्यालय से जुड़ा हर व्यक्ति ,यहाँ तक कि अभिभावकगण भी अपने आपको धन्य मानते हैं कि उनका इस स्कूल के साथ एक नाता जुड़ा है।
सिमी मैम के अथक परिश्रम का ही नतीजा है कि आज यह स्कूल सचमुच विद्या के मंदिर के रुप में प्रतिष्ठापित हो चुका है।