Sunday, 15 November 2015

इंतज़ार



अपने ज़ज़्बातों का इजहार करुं किससे!
कौन है वह ,कहाँ है वह, अपना कहूँ किसे!
वो आसपास कहीँ नजर आता नहीं।
उसका पता कोई बतलाता नहीं।

इक उम्र गुजार दी हमने,
करते उनका इंतज़ार ।
न जाने वो घडी कब आएगी ,
कि होगा मुझे दीदारे - यार ।

आँखों से अश्क सूख गए,
राह उनकी तकते - तकते।
लबों से लफ़्ज रूठ गये,
इंतजारे मोहब्बत करते- करते।

अब ये आलम है कि,
मेरा अक्स मुझे दिखता नहीं।
कहीँ देर इतनी
न हो जाये कि
मेरी रूह मेरा साथ छोड़  दे।